विदेशी हितों को तरजीह


[खुदरा कारोबार में एफडीआइ को किसानों, उपभोक्ताओं और निर्माताओं, तीनों के लिए घाटे का सौदा मान रहे है देविंदर शर्मा]

ऐसे समय जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुदरा कारोबार में एफडीआइ खोलने के फैसले को देशहित में बताते हुए इसे वापस लेने से इंकार कर रहे है, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की राय इससे उलट है। 26 नवंबर को उन्होंने ट्वीट किया-अपनी पसंदीदा स्थानीय दुकान से सामान खरीदकर छोटे व्यापारियों का समर्थन करे। ओबामा अपने देश के हित की बात कर रहे है, जबकि मनमोहन सिंह अमेरिकी हितों को सुरक्षित करने की। मनमोहन सिंह की यह दलील तथ्यों पर खरी नहीं उतरती कि रिटेल एफडीआइ से हमारे देश को फायदा होगा, ग्रामीण ढांचागत सुविधाओं में सुधार होगा, कृषि उत्पादों की बर्बादी कम होगी और हमारे किसान अपनी फसल के बेहतर दाम हासिल कर सकेंगे। परेशानी की बात यह है कि वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दलीलों का कोई आर्थिक आधार नहीं है। इनकी महज राजनीतिक उपयोगिता है। इनसे यही पता चलता है कि सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे को न्यायोचित ठहराने के लिए आर्थिक तथ्यों को किस तरह तोड़ा-मरोड़ा और गढ़ा जा सकता है।

मल्टी ब्रांड रिटेल के पक्ष में सबसे बड़ी दलील यह है कि इससे सन 2020 तक एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे। इस दावे के पीछे कोई तर्क नहीं है। अमेरिका में रिटेल कारोबार में वालमार्ट का वर्चस्व है। इसका कुल कारोबार चार सौ अरब डॉलर [लगभग 20 लाख करोड़ रुपये] है, जबकि इसमें महज 21 लाख लोग काम करते है। विडंबना है कि भारत का कुल रिटेल क्षेत्र भी 20 लाख करोड़ रुपये का है, जबकि इसमें 4.40 करोड़ व्यक्ति काम करते है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय रिटेल कहीं बड़ा नियोक्ता है और वालमार्ट सरीखे विदेशी रिटेलरों को भारत में बुलाने से करोड़ों लोगों का रोजगार छिन जाएगा। इंग्लैंड में दो बड़ी रिटेल चेन टेस्को और सेंसबरी है। दोनों ने पिछले दो वर्षो में 24,000 रोजगार देने का वायदा किया था, जबकि इस बीच इन्होंने 850 लोगों को नौकरी से निकाल दिया।

आनंद शर्मा का कहना है कि रिटेल एफडीआइ से किसानों की आमदनी 30 प्रतिशत बढ़ जाएगी। इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। उदाहरण के लिए अगर वालमार्ट किसानों की आमदनी बढ़ाने में सक्षम होती तो अमेरिकी सरकार को यूएस फार्म बिल 2008 के तहत 307 अरब डॉलर [करीब 15.35 लाख करोड़ रुपये] की भारी-भरकम सब्सिडी नहीं देनी पड़ती। इनमें से अधिकांश सब्सिडी विश्व व्यापार संगठन के ग्रीन बॉक्स में जोड़ी जाती है। अगर ग्रीन बॉक्स सब्सिडी वापस ले ली जाती है तो अमेरिकी कृषि का विनाश हो जाएगा। 30 धनी देशों के समूह की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। इन देशों में 2008 में 21 फीसदी और 2009 में 22 फीसदी सब्सिडी बढ़ गई है। केवल 2009 में ही इन औद्योगिक देशों ने 12.6 लाख करोड़ रुपये की कृषि सब्सिडी दी है। इसके बावजूद यूरोप में हर मिनट एक किसान खेती छोड़ देता है। यह इसलिए हो रहा है कि वहां किसानों की आय लगातार गिर रही है। केवल फ्रांस में 2009 में किसानों की आमदनी 39 फीसदी गिर गई है।

सरकार की तीसरी दलील है कि बड़ी रिटेल कंपनियां बिचौलियों को हटा देती हैं, जिस कारण किसानों को बेहतर कीमत मिलती है। एक बार फिर यह झूठा दावा है। अध्ययनों से पता चलता है कि बीसवीं सदी के पूर्वा‌र्द्ध में अमेरिका में प्रत्येक डॉलर की बिक्री पर किसान को 70 सेंट बच जाते थे, जबकि 2005 में किसानों की आमदनी महज 4 फीसदी रह गई है। यह वालमार्ट और अन्य बड़े रिटेलरों की मौजूदगी में हुआ है। दूसरे शब्दों में जैसी की आम धारणा है, बड़े रिटेलरों के कारण बिचौलिए गायब नहीं होते, बल्कि बढ़ जाते है। नए किस्म के बिचौलिए पैदा हो जाते है जैसे गुणवत्ता नियंत्रक, मानकीकरण करने वाले, सर्टिफिकेशन एजेंसी, प्रोसेसर, पैकेजिंग सलाहकार आदि इसी रिटेल जगत के अनिवार्य अंग होते है और ये सब किसानों की आमदनी में से ही हिस्सा बांटते है। यही नहीं, बड़े रिटेलर किसानों को बाजार मूल्य से भी कम दाम चुकाते है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में टेस्को किसानों को चार फीसदी कम मूल्य देती है। सुपरमार्केटों के कम दामों के कारण ही स्कॉटलैंड में किसान ‘फेयर डील फूड’ संगठन बनाने को मजबूर हुए है।

चौथी दलील यह है कि रिटेल एफडीआइ छोटे व मध्यम उद्योगों से 30 प्रतिशत माल खरीदेंगे और इस प्रकार भारतीय निर्माताओं को लाभ पहुंचेगा। यह लोगों को भ्रमित करने वाली बात है। सच्चाई यह है कि विश्व व्यापार संगठन के समझौते के तहत भारत किसी भी बड़े रिटेलर को कहीं से भी सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यह विश्व व्यापार संगठन के नियमों के खिलाफ है और कोई भी सदस्य देश इसका उल्लंघन कर जीएटीटी 1994 की धारा 3 या धारा 11 के तहत निवेश प्रतिबंध झेलने की मुसीबत मोल नहीं ले सकता। विश्व व्यापार संगठनों के प्रावधानों का इस्तेमाल कर मल्टी ब्रांड रिटेल सस्ते चीनी उत्पादों से बाजार पाट देंगे और छोटे भारतीय निर्माताओं को बर्बादी के कगार पर पहुंचा देंगे। निवेश नियमों की आड़ में रिटेलर भारत में खाद्यान्न भंडारण व परिवहन आदि का बुनियादी ढांचा भी खड़ा करने नहीं जा रहे है। नियम के अनुसार कंपनियों के मुख्यालय में होने वाला खर्च भी भारत में निवेश में जुड़ जाएगा। इस प्रकार भारत में एक भी पैसा निवेश किए बिना ही रिटेल एफडीआइ 50 प्रतिशत से अधिक निवेश कर चुके है। पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के अध्ययन ‘वालमार्ट और गरीबी’ से पता चलता है कि अमेरिका के जिन राज्यों में वालमार्ट के स्टोर अधिक है उनमें गरीबी दर भी अधिक है। यह ऐसे देश के लिए खतरे की घंटी है जिसकी आधी से अधिक आबादी गरीबी, भुखमरी और मलिनता में जीवन बिता रही है।

[लेखक: खाद्य एवं कृषि नीतियों के विश्लेषक है]

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22 नवंबर 2011 को संसद में पेश हो रहे बी.आर.ए.आई. बिल का विरोध करें

 

22 नवंबर 2011 को संसद में पेश हो रहे बी.आर.ए.आई. बिल का विरोध करें

चूँकि

यह ‘बायोटेक्नोलॉजी रेग्युलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया बिल’ गलत उद्देश्य के लिए बनाया गया गलत बिल है

मान्यवर,

पिछले साल पहली जीएम खाद्द्य फसल को लेकर पूरे देश में जोरदार बहस छिड़ी। बीटी बैंगन के रूप में पहली जीएम (जेनटिक मोडिफाइड) खाद्य फसल को वर्ष2009  में केंद्र सरकार की परिनियमित इकाई (जीइएसी)ने व्यावसायिक खेती की अनुमति दे दी थी। लेकिन इस विवादास्पद खाद्य फसल पर चली देशव्यापी बहस को देखते हुए केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री ने सतर्कता बरती और बीटी बैंगन पर रोक लगा दी। उन्होंने कहा कि जब तक स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों से सार्वजनिक और व्यावसायिक रूप से यह स्थापित नहीं हो जाता कि इस फसल का मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कोई दीर्घकालीन दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा और बैंगन की मौजूदा असीम विविधता को खतरा नहीं है और यह तकनीकी सुरक्षा सम्बंधित मापदंडों पर खरी नहीं उतरती, उसे अनुमति नहीं दी जायेगी। 

बी.आर.ए.आई. की उत्पत्ति

2003-04 में देश में पहली बार नेशनल बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी अथारिटी के रूप में एक स्वायत्त नियामक प्राधिकरण बनाने की बात उठी थी। इसकी सिफारिश कृषि मंत्रालय की तरफ से बनाये गये टास्क फोर्स के अध्यक्ष डा० एम० एस० स्वामीनाथन ने की थी। टास्क फोर्स ने बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी गठन के लिए कुछ आधारभूत सुझाव भी दिये थे। जैसे-किसी भी बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी नीति निर्धारण के लिए पर्यावरण, किसान वर्ग, सतत कृषि प्रणाली, स्वास्थ्य एवं पौष्टिकता को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ में उपभोक्ता एवं राष्ट्र में व्यापार तथा जैव सुरक्षा के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के जैव प्रोद्यौगिकी विभाग ने वर्ष 2008 में पहली बार एन बी आर ए बिल प्रस्तुत किया और जनता से राय मांगी। इस बिल की प्रक्रिया और विषयवस्तु दोनों की कटु आलोचना हुई और विरोध हुआ। प्रस्तावित बिल का विरोध मुख्य रूप से गलत प्राथमिकता तय करने व जीएम फसलों को बढ़ावा देने वालों को ही नियामक बना देने की वजह से हुआ। सिविल सोसायटी ने तो बिल की प्रमुख खामियों पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखित रूप से अपना विरोध दर्ज कराया।

ब्राई का अगला प्रारूप वर्ष 2009 में तैयार किया गया, जिसके गुप्त दस्तावेज मार्च 2010 में लीक हो गये। इस बिल पर भी काफी हंगामा हुआ क्योंकि इसमें जीएम फसलों के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान किया गया था। इसे देखकर ऐसा मालूम हुआ कि इस बिल में सुधार की जगह और खतरनाक स्वरुप प्रदान कर दिया गया। इस प्रारूप में ऐसी धाराएँ शामिल थी जो अलोकतांत्रिक और गुपचुप तरीके से पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के बिना और दुष्प्रभावों का व्यापक आंकलन किये बिना ही नियमों को शिथिल करके जीएम फसलों को जल्दी मंजूरी देने की वकालत कर रहे थे।

हालांकि अभी कुछ समय पहले ही राज्य सरकारों की सत्ता को मान्यता दी गई है कि अब वे अपने राज्य में जीएमओ (जैव परिवर्धित फसलों) के स्थलीय परीक्षणों को मंजूरी देने और न देने का फैसला खुद ले सकते हैं। ऐसा तब हुआ जब बिहार के मुख्यमंत्री ने बिना राज्य सरकार को जानकारी दिये और बिना उसकी सहमति लिए बिहार में किये जा रहे स्थलीय परीक्षणों का विरोध किया। इससे पहले केरल सरकार ने अपने राज्य के लिए एक जीएम फ्री पॉलिसी की घोषणा कर दी थी जिसे बाद में संसद में भी उचित कदम माना गया।

वर्तमान बी.आर.ए.आई. बिल

यह बिल 22 नवंबर 2011 को लोकसभा की कार्यवाही की दैनिक सूची में चिन्हित है। यहाँ यह बताना जरूरी है कि जिस समय यह बिल पेश करने की तैयारी चल रही है, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल जैसे 7 राज्य जी एम फसलों के परिक्षण को मना कर चुके हैं। अब देश भर के हजारों गांव खुद को जीएम मुक्त घोषित कर रहे हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है हमारे लिए इस बिल से जुडना?

• ऐसा लगता है कि हमें कृषि तकनीकों से जुड़ी बहस में शामिल होने की आवश्यकता है। दूसरी अन्य तकनीकों के विपरीत, ये तकनीकें हमारे ऊपर ज्यादा असर डालने जा रही हैं। वो भी सिर्फ इस कारण से कि ज्यादातर जमीन कृषि के अंदर आती है और देश के ज्यादातर लोगों की रोज़ी रोटी करशी से जुडी हुई है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जो खाना खाते हैं वह भी कृषि से ही मिलता है। ऐसा लगता है कि अब हमें ट्रांसजेनिक्स जैसी तकनीकों से जुड़ने की जरूरत है।

• यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हमारा भोजन असुरक्षित होता जा रहा है। जीएम फसलों व खाद्यान्न के आने से उसके जहरीले होने की संभावना भी बढ़ गई है। इसलिए इस कानूनका एक हीं उद्देश्य होना चाहिए की भारतीयों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को रोकना। इसीलिए इस बिल के पेश किये जाने का विरोध करने की जरूरत है।

बिल के महत्वपूर्ण विन्दु जिनपर मुख्य रूप से आपत्ति है

Ø  यह बिल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लाया जा रहा है जिससे ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ पैदा हो रहा है, चूँकि यह वही मंत्रालय है जो आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में क्या प्रोत्साहक हीं नियामक होंगे?

Ø  इस नियामक बिल का मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी का सुरक्षित इस्तेमाल और उसे बढ़ावा देना है। किसी भी तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए एक कानून की जरूरत नहीं होती।कानून सिर्फ उसी परिस्थिति में बनाया जाता है जब स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं जीविका को आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के खतरे से बचाना हो। परन्तु ऐसा  कुछ भी इस बिल में नहीं कहा गया है।

Ø  इस बिल का वास्तव में परिणाम एवं प्रभाव कई अधिनियमों पर पड़ता है और साथ हीं उन अधिनियमों  के अधिकार क्षेत्र को भी प्रभावित करता है, जैसे पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम, वनाधिकार अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, दवा एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, पंचायती राज अधिनियम, नगरपालिका अधिनियम, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। अतः जो बिल इतने व्यापक स्तर पर इतने सारे अधिनियमों को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो उसके लिए उतनी हीं गंभीरता से व्यापक बहस होनी चाहिए थी, जो अब तक देखने को नहीं मिला।

Ø  यह बिल भारतीय संविधान के संघीय सिधान्तों के भी खिलाफ है तथा पंचायती राज संस्थाओं को भी कमजोर बनाता है। यह बिल हमारे संघीय ढाँचे तथा पंचायती राज जैसी संस्थाओं के कृषि, स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण को भी गौण करता है तथा हर निर्णय सिर्फ एवं सिर्फ एक केंद्रीय संस्था में हीं निहीत करने की बात करता है। 

साथ हीं
1.गलत उद्देश्यों के साथ गलत मंत्रालय द्वारा पेश किया जाना
2. विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के अधीन हितों के टकराव का विरोध
3.कृषि व स्वास्थ्य मामले में राज्य सरकारों के अधिकारों पर अतिक्रमण
4. मूल्यांकन की कोई आवश्यकता नहीं
5. लोकतांत्रिक कार्य शैली का अभाव-जन सहभागिता की कोई व्यवस्था नहीं
6. पारदर्शिता के लिए कोई व्यवस्था नहीं–सूचना पाने वाले नागरिकों के अधिकार का अतिक्रमण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण
7. तमाम संस्थाएं मौजूद लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया केन्द्रीयकृत व संकीर्ण
8. दंतहीन पर्यावरण मूल्यांकन पैनल
9.निर्णय लेने के मापदंडों को शिथिल करना
10. जैव सुरक्षा व जोखिमों से समझौता करना–खुली हवा में हो रहे परीक्षणों पर अंकुश लगाने के लिए कोई कोशिश नहीं की गई है
11. स्वतंत्र परीक्षण बिल का हिस्सा नहीं हैं
12. कोई जोखिम प्रबंधन तंत्र का न होना
13. हितों के टकराव को पूरी तरह दूर न करना
14. पैनल की धाराओं का कमजोर होना
15.जैव प्रोद्यौगिकी नियामक अपीलीय प्राधिकरण कमजोर और लोगों की न्याय व्यवस्था से दूर करनेवाली
16. दूसरे कानूनों पर अतिक्रमण का असर
17. जीएमओ आयात पर खामोश रहना आदि।


इस बिल पर अधिक जानकारी एवं अन्य खामियों को जानने के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ – http://indiagminfo.org/?page_id=82 हमें खुशी होगी यदि और कुछ विशेष जानकारी के लिए एवं किसी सम्बंधित दस्तावेज के लिए आप हमें संपर्क करते हैं। यह बिल गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है. अतः हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप कृपया २२ नवंबर २०११ को प्रातः १० बजे से पहले-पहले माननीय लोकसभा अध्यक्ष एवं महासचिव को लिखित रूप से इस बिल की introduction के विरुद्ध अपना विरोध पत्र अवश्य भेजें।


अगर किन्ही परिस्थितियों में यह बिल फिर भी पेश हो जाता है तो कृपा कर जरूर सुनिश्चित करें कि तब इसे कम से कम कृषि/स्वास्थ्य/पर्यावरण और विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी के संयुक्त समिति में अवश्य भेजा जाये।

निवेदक :

राष्ट्रीय आशा गठबन्धन                                                                         जी एम मुक्त भारतीय गठबन्धन

नरेगा के क्रियांवय में सुधार: ग्रामीण विकास मंत्रित्व शाका

जैसे की आप जानते हैं, नए ग्रामीण विकास मंत्री ने कई घोषणाएँ की हैं. ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक सितम्बर को एक नया “नोट” जारी किया है, “नरेगा के क्रियांवय में सुधार” के नाम से, जिसमें “नरेगा के क्रियांवय में ९ मुख्य चुनौतियाँ और उनको सुलझाने के उपाय” पर टिप्पणी और सुझाव मांगे गए हैं, “दो या तीन हफ्ते” के अंदर. जिन चुनोतियों से यह “नोट” निपटने का लक्ष्य रखता है (जैसे की मांग पर काम, भुगतान में होने वाली देरी कम करना) उनसे जमीनी संगठन झूझते आये हैं, और यह महत्वपूर्ण है की वे अपने सुझाव इस “नोट” पर मंत्रालय को दें. क्योंकि यह इस नोट में नहीं लिखा है की यह सुझाव किसको देने हैं, आप ग्रामीण विकास मंत्री को फैक्स कर सकते हैं (इन नंबरों पर), उनके निजी सचिव आर विनील कृष्णा को vineelkrishna@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं या मीडिया में लिख सकते हिन्. अपने सुझाव ज़रूर भेजें, और एक प्रति रोज़गार को भी भेजें, जिससे वह अगली अपडेट में शामिल की जा सके. रोज़गार अपडेट अनियमित हो गयी हैं, और इसके लिए हम आपसे माफ़ी चाहते हैं. अगली अपडेट जल्द ही होगी. बाकी घोषणाएँ “दिल्ली में देवेलोप्मेंट” में हैं, जिन में से यह स्पष्टीकरण की नरेगा का काम खेती के दिनों में स्थगित नहीं किया जा सकता, और नरेगा स्कीमों के जांच की नियम मुख्य हैं. फील्ड से भी के ज़रूरी अपडेट हैं.

बायो तकनीकी नियंत्रण अथारिटी 2011: बिल और विमर्श

पार्लमेंट के सामने पेश करने वाले बायो तकनीकी नियंत्रण अथारिटी 2011 बिल और विमर्श.
बायो तकनीकी नियंत्रण अथारिटी 2011
बायो तकनीकी नियंत्रण अथारिटी 2011 विमर्श

मध्य प्रदेश सर्कार की जैविक कृषि नीति

  • जैविक खेती क्यों ?ह्ण मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण – आज यह तथ्य निर्विवाद हो चुका हैं कि रसायनिक उर्वरकों तथा पेस्टीसाइडों के लगातार तथा अविवेकपूर्ण उपयोग के चलते मिट्‌टी के स्वास्थ्य मे गिरावट तथा पर्यावरण प्रदूषित हो चुका हैह्ण रसायनों के उपयोग से पैदा होने वाले खाद्यान्न, फल और सब्जियॉं विषैले होकर इनमें स्वभाविक स्वाद नहीं रहा हैं ।
  • ह्ण मनुष्य स्वास्थ्य – रसायनों के उपयोग से मनुष्यों में तरह-तरह की बीमारियों देखने में आ रही हैं।
  • ह्ण अधिक उत्पादन लागत – रसायनों के मॅंहगें तथा अत्यधिक उपयोग के कारण खेती की लागत बढ़ रही हैं जिसके कारण कृषकों का खेती से मोहभंग हो रहा हैं।ह्ण विषरहित खाद्यान्न के प्रति बढ ती वैद्गिवक एवं स्थानीय जागृति के कारण जैविक कृषि पद्धति से उत्पादित खाद्यान्नों, फल तथा सब्जियों की मॉंग स्थानीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में बढ  रही हैं। ह्ण स्थायी कृषि विकास ;ैन्ैज्।प्छ।ठस्म् ।ळत्प्ब्न्स्ज्न्त्म् क्म्टम्स्व्च्डम्छज्द्ध हेतु जैविक कृषि ही एक मात्र एवं समुचित समाधान प्रतीत होता है।ह्ण प्रदेद्गा में जैविक कृषि की असीम सम्भावनाएं एवं अनुकुल वातावरण उपलब्ध है।ह्ण जैविक कृषि हेतु राज्य के प्रयासों को उचित दिद्गाा, गति एवं नवीन उर्जा के संचार हेतु राज्य में एक समग्र जैविक कृषि नीति की आवद्गयकता को सभी वर्गो द्वारा महसूस किया गया है।
  • २. जैविक खेती से आशय :-
    फसलोत्पादन के लिये उर्वरकों और कीटनाद्गाकों के रुप में उपयोग में लाये जाने वाले रसायनों के स्थान पर गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद तथा बायोपेस्टीसाइड्‌स आदि का उपयोग करना ही सरल भाषा में जैविक खेती है।
    ३. रसायनिक उर्वरकों तथा पेस्टीसाइड्‌स का उपयोग क्यों बढ़ा ? वर्ष १९६६-६७ में देश में हरित क्रान्ति आने के पूर्व हमारे देश के कृषकों के समक्ष सिंचाई के साधन, उन्नत बीज, रसायनिक उर्वरकों /पेस्टीसाइड्‌स की उपलब्धता तथा खेती की उन्नत विधियॉं नहीं थी। हरित क्रान्ति के माध्यम से उक्त चारों घटकों पर कृषि उत्पादन बढाने के लिये कार्य किया गया जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश का उत्पादन बढ ता गया और हम खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हुये परन्तु यह ग्रीन रिव्योलूशन एवरग्रीन साबित नहीं हुयी ।
  • ४. इसके दुष्प्रभावों के चलते हमारी -ह्ण देद्गा के कई क्षेत्रों की मृदा अम्लीय तथा क्षारीय हो गयी और अभी भी मृदा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट हो रहा है। ह्ण रसायनों के कारण पानी की गुणवत्ता खराब हुयी तालाब /नदियों का जल भी प्रदूषित हो रहा है।ह्ण मिट्‌टी की जल-धारण क्षमता कम हुयी है। ह्ण फ्‌लोरा और फौना नष्ट हो रहे हैं। ह्ण हमारा खाद्यान्न उत्पादन बढोत्तरी का भी ग्राफ स्थिर हो चुका है।ह्ण रसायन मॅंहगे होने कारण खेती की लागत लगातार बढ रही है।
    ५. जैविक कृषि नीति के मुखय विशेषता- इस नीति के माध्यम से हम कृषि के उत्पादन के लिये जिम्मेदार चार बाह्‌य घटक क्रमद्गाः जल के साधन, उन्नत बीज, रसायनिक उर्वरक व पेस्टीसाइड्‌स तथा गुड एग्रीकल्चर प्रेक्टीस में से सिर्फ रसायनिक उर्वरक/ पेस्टीसाइड्‌स को ही गोबर की खाद /कम्पोस्ट/ हरी खाद तथा बायो-पेस्टीसाइड्‌स से प्रतिस्थापित करने पर जोर दे रहे हैं। नीति में गौ-वंश आधारित कृषि को अपनाने पर बल दिया हैं जैसा सर्वविदित हैं ।हतपबनसजनतम ूपजीवनज ंदपउंसे पे बतपउम ूपजी दंजनतमण्
  • ६. जैविक कृषि के लागू करने में सरकार की चिन्ता तथा चुनौतियां  ह्ण मुखय प्रश्न यह हैं कि रसायनिक उर्वरक तथा पेस्टीसाइड्‌स के उपयोग से पर्यावरण / मृदा स्वास्थ्य/ मनुष्य का स्वास्थ्य गिर रहा हैं उससे आम कृषक का कोई सरोकार नहीं हैं यह प्रश्न सरकार के लिये विचारणीय हो सकता हैं। कृषक तो वही करेगा जिसमें उसे अधिक आर्थिक लाभ मिले। वह रसायनिक उर्वरकों/ पेस्टीसाइड्‌स को न अपनाकर अपने खेत के उत्पादन को कम होने के खतरे को क्यों मोल लेगा ? अर्थात हम कृषकों को जैविक खेती अपनाने के लिये कैसे प्रोत्साहित करें।ह्ण जैविक खेती हेतु रसायनिक रसायनों के विकल्प के रूप में समुचित मात्रा में कम्पोस्ट/गोबर खाद/ हरी खाद तथा बायो-पेस्टीसाइड्‌स कैसे उपलब्ध हों।ह्ण जैविक पद्धति द्वारा उत्पादित खाद्यान्न, फल तथा सब्जियों के लिये बेहतर मार्केट के अवसर कैसे उपलब्ध कराये जाये जिससे कृषक जैविक खेती के अपनाने से हुए कम उत्पादन का अधिक मूल्य प्राप्त कर हानि की भरपाई कर सकें।ह्ण जैविक कृषि पद्धति से ही उत्पादित खाद्यान्नों, फल व सब्जियों को कैसे प्रमाणित किया जाये ! उपरोक्त चुनौतियों का समाधान तथा सरकार की चिन्ता का निराकरण इस नीति के माध्यम से रणनीतिक सोच को एक प्रखर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अत्यन्त व्यवहारिक एवं व्यवसायिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। ७.  इस नीति के सफल क्रियान्वयन के पश्चात्‌ हम :-ह्ण खेती की लागत कम कर सकेंगे उत्पादन में स्थिरता एवं स्थाई वृद्धि दर प्राप्त होकर खेती टिकाउ होगी।ह्ण स्वादिष्ट तथा विष रहित खाद्यान्न, फल, सब्जियॉं, दूध, साग, रेद्गाा आदि उत्पादित कर इनकी मूल्य श्रंखला विकसित कर सकेगें।ह्ण मृदा स्वास्थ्य के गिरते स्तर को संवारकर मृदा कार्बनिक पदार्थ को यथोचित स्तर पर लाकर, विषैले एवं अति हानिकारक रसायनों का प्रयोग कम कर पर्यावरण को स्वच्छ तथा विष-रहित कर सकेगे।
  • ह्ण प्रदेद्गा के सीमांत व लघु किसान जैविक पद्धति से खाद्यान्न उत्पादित कर उच्च दरों पर विक्रय कर अधिक मुनाफा कमा सकेगा।ह्ण ग्रामीण युवाओं को गॉवं में ही रोजगार के अवसर मुहैया किये जा सकेंगे। ह्ण कृषक अपनी उपज को अपनी मर्जी से अपने मन-माफिक भाव में बेच सकेगा जिससे उसकी उपज का उसे अधिक से अधिक मूल्य तो मिलेगा ही तथा उपभोक्ता को भी स्वादिष्ट तथा विषरहित ताजा खाद्यान्न/फल/सब्जियॉं प्राप्त होगी।ह्ण द्गाहरी तथा ग्रामीण कचरा आज की गंभीर समस्या बन चुका है इस कचरे को बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित कर खेती हेतु उपलबध कराकर प्रदेशवासियों को कचरे की समस्या से निजात दिलाई जा सकेगी। ह्ण कृषकों को अपना उत्पाद मंडियों तक लाने में परिवहन लागत वहन करनी पडती हैं और बिचौलिये भी कृषकों का मण्डी में शोषण करते हैं। इससे कृषकों को शनैःद्गानैः मुक्ति मिलेगी। ह्ण नीति के अनुमोदन एवं क्रियान्वयन पर प्रदेद्गा का राष्ट्र में गौरव बढेगा। ह्ण प्रदेद्गा राष्ट्र का प्रथम जैविक राज्य होने का सम्मान अर्जित कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विद्गोष छवि बना सकेगा।
  • ८. मध्यप्रदेद्गा सरकार तथा भारतीय जनता पार्टी की पहल- ह्ण आधुनिक रसायन आधारित खेती के दुष्परिणामों के दृष्टिगत रखते हुये दूरदद्गर्िाता का परिचय देते हुये भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष २००८ में प्रदेद्गा में जैविक कृषि पद्धति से खेती करने को प्रोत्साहित करने हेतु जनता से वायदा किया अर्थात जन संकल्प ०८ के जैविक कृषि को बढाबा देना, प्रदेद्गा को जैविक प्रदेद्गा बनाना तथा प्रदेद्गा में जैविक कृषि विद्गवविद्यालय की स्थापना करना महत्वपूर्ण बिषय हैं।ह्ण मध्यप्रदेद्गा सरकार, माननीय मुखयमंत्री जी के योग्य एवं उर्जावान मार्गदर्द्गान में ”कृषि को लाभकारी ” बनाने हेतु कृतसंकल्पित है। सरकार व पार्टी की प्रतिवद्वता तथा सच्चेधरापुत्र के नाते जैविक कृषि के क्रियान्वयन के पुनीत कार्य को पूर्ण करने के क्रम में यह नीति तैयार की हैं।