22 नवंबर 2011 को संसद में पेश हो रहे बी.आर.ए.आई. बिल का विरोध करें

 

22 नवंबर 2011 को संसद में पेश हो रहे बी.आर.ए.आई. बिल का विरोध करें

चूँकि

यह ‘बायोटेक्नोलॉजी रेग्युलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया बिल’ गलत उद्देश्य के लिए बनाया गया गलत बिल है

मान्यवर,

पिछले साल पहली जीएम खाद्द्य फसल को लेकर पूरे देश में जोरदार बहस छिड़ी। बीटी बैंगन के रूप में पहली जीएम (जेनटिक मोडिफाइड) खाद्य फसल को वर्ष2009  में केंद्र सरकार की परिनियमित इकाई (जीइएसी)ने व्यावसायिक खेती की अनुमति दे दी थी। लेकिन इस विवादास्पद खाद्य फसल पर चली देशव्यापी बहस को देखते हुए केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री ने सतर्कता बरती और बीटी बैंगन पर रोक लगा दी। उन्होंने कहा कि जब तक स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों से सार्वजनिक और व्यावसायिक रूप से यह स्थापित नहीं हो जाता कि इस फसल का मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कोई दीर्घकालीन दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा और बैंगन की मौजूदा असीम विविधता को खतरा नहीं है और यह तकनीकी सुरक्षा सम्बंधित मापदंडों पर खरी नहीं उतरती, उसे अनुमति नहीं दी जायेगी। 

बी.आर.ए.आई. की उत्पत्ति

2003-04 में देश में पहली बार नेशनल बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी अथारिटी के रूप में एक स्वायत्त नियामक प्राधिकरण बनाने की बात उठी थी। इसकी सिफारिश कृषि मंत्रालय की तरफ से बनाये गये टास्क फोर्स के अध्यक्ष डा० एम० एस० स्वामीनाथन ने की थी। टास्क फोर्स ने बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी गठन के लिए कुछ आधारभूत सुझाव भी दिये थे। जैसे-किसी भी बायोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी नीति निर्धारण के लिए पर्यावरण, किसान वर्ग, सतत कृषि प्रणाली, स्वास्थ्य एवं पौष्टिकता को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ में उपभोक्ता एवं राष्ट्र में व्यापार तथा जैव सुरक्षा के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के जैव प्रोद्यौगिकी विभाग ने वर्ष 2008 में पहली बार एन बी आर ए बिल प्रस्तुत किया और जनता से राय मांगी। इस बिल की प्रक्रिया और विषयवस्तु दोनों की कटु आलोचना हुई और विरोध हुआ। प्रस्तावित बिल का विरोध मुख्य रूप से गलत प्राथमिकता तय करने व जीएम फसलों को बढ़ावा देने वालों को ही नियामक बना देने की वजह से हुआ। सिविल सोसायटी ने तो बिल की प्रमुख खामियों पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखित रूप से अपना विरोध दर्ज कराया।

ब्राई का अगला प्रारूप वर्ष 2009 में तैयार किया गया, जिसके गुप्त दस्तावेज मार्च 2010 में लीक हो गये। इस बिल पर भी काफी हंगामा हुआ क्योंकि इसमें जीएम फसलों के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान किया गया था। इसे देखकर ऐसा मालूम हुआ कि इस बिल में सुधार की जगह और खतरनाक स्वरुप प्रदान कर दिया गया। इस प्रारूप में ऐसी धाराएँ शामिल थी जो अलोकतांत्रिक और गुपचुप तरीके से पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के बिना और दुष्प्रभावों का व्यापक आंकलन किये बिना ही नियमों को शिथिल करके जीएम फसलों को जल्दी मंजूरी देने की वकालत कर रहे थे।

हालांकि अभी कुछ समय पहले ही राज्य सरकारों की सत्ता को मान्यता दी गई है कि अब वे अपने राज्य में जीएमओ (जैव परिवर्धित फसलों) के स्थलीय परीक्षणों को मंजूरी देने और न देने का फैसला खुद ले सकते हैं। ऐसा तब हुआ जब बिहार के मुख्यमंत्री ने बिना राज्य सरकार को जानकारी दिये और बिना उसकी सहमति लिए बिहार में किये जा रहे स्थलीय परीक्षणों का विरोध किया। इससे पहले केरल सरकार ने अपने राज्य के लिए एक जीएम फ्री पॉलिसी की घोषणा कर दी थी जिसे बाद में संसद में भी उचित कदम माना गया।

वर्तमान बी.आर.ए.आई. बिल

यह बिल 22 नवंबर 2011 को लोकसभा की कार्यवाही की दैनिक सूची में चिन्हित है। यहाँ यह बताना जरूरी है कि जिस समय यह बिल पेश करने की तैयारी चल रही है, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल जैसे 7 राज्य जी एम फसलों के परिक्षण को मना कर चुके हैं। अब देश भर के हजारों गांव खुद को जीएम मुक्त घोषित कर रहे हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है हमारे लिए इस बिल से जुडना?

• ऐसा लगता है कि हमें कृषि तकनीकों से जुड़ी बहस में शामिल होने की आवश्यकता है। दूसरी अन्य तकनीकों के विपरीत, ये तकनीकें हमारे ऊपर ज्यादा असर डालने जा रही हैं। वो भी सिर्फ इस कारण से कि ज्यादातर जमीन कृषि के अंदर आती है और देश के ज्यादातर लोगों की रोज़ी रोटी करशी से जुडी हुई है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जो खाना खाते हैं वह भी कृषि से ही मिलता है। ऐसा लगता है कि अब हमें ट्रांसजेनिक्स जैसी तकनीकों से जुड़ने की जरूरत है।

• यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हमारा भोजन असुरक्षित होता जा रहा है। जीएम फसलों व खाद्यान्न के आने से उसके जहरीले होने की संभावना भी बढ़ गई है। इसलिए इस कानूनका एक हीं उद्देश्य होना चाहिए की भारतीयों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को रोकना। इसीलिए इस बिल के पेश किये जाने का विरोध करने की जरूरत है।

बिल के महत्वपूर्ण विन्दु जिनपर मुख्य रूप से आपत्ति है

Ø  यह बिल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लाया जा रहा है जिससे ‘कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ पैदा हो रहा है, चूँकि यह वही मंत्रालय है जो आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में क्या प्रोत्साहक हीं नियामक होंगे?

Ø  इस नियामक बिल का मुख्य उद्देश्य प्रौद्योगिकी का सुरक्षित इस्तेमाल और उसे बढ़ावा देना है। किसी भी तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए एक कानून की जरूरत नहीं होती।कानून सिर्फ उसी परिस्थिति में बनाया जाता है जब स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं जीविका को आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के खतरे से बचाना हो। परन्तु ऐसा  कुछ भी इस बिल में नहीं कहा गया है।

Ø  इस बिल का वास्तव में परिणाम एवं प्रभाव कई अधिनियमों पर पड़ता है और साथ हीं उन अधिनियमों  के अधिकार क्षेत्र को भी प्रभावित करता है, जैसे पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, जैव विविधता अधिनियम, वनाधिकार अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, दवा एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, पंचायती राज अधिनियम, नगरपालिका अधिनियम, सूचना का अधिकार अधिनियम आदि। अतः जो बिल इतने व्यापक स्तर पर इतने सारे अधिनियमों को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो उसके लिए उतनी हीं गंभीरता से व्यापक बहस होनी चाहिए थी, जो अब तक देखने को नहीं मिला।

Ø  यह बिल भारतीय संविधान के संघीय सिधान्तों के भी खिलाफ है तथा पंचायती राज संस्थाओं को भी कमजोर बनाता है। यह बिल हमारे संघीय ढाँचे तथा पंचायती राज जैसी संस्थाओं के कृषि, स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण को भी गौण करता है तथा हर निर्णय सिर्फ एवं सिर्फ एक केंद्रीय संस्था में हीं निहीत करने की बात करता है। 

साथ हीं
1.गलत उद्देश्यों के साथ गलत मंत्रालय द्वारा पेश किया जाना
2. विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय के अधीन हितों के टकराव का विरोध
3.कृषि व स्वास्थ्य मामले में राज्य सरकारों के अधिकारों पर अतिक्रमण
4. मूल्यांकन की कोई आवश्यकता नहीं
5. लोकतांत्रिक कार्य शैली का अभाव-जन सहभागिता की कोई व्यवस्था नहीं
6. पारदर्शिता के लिए कोई व्यवस्था नहीं–सूचना पाने वाले नागरिकों के अधिकार का अतिक्रमण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण
7. तमाम संस्थाएं मौजूद लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया केन्द्रीयकृत व संकीर्ण
8. दंतहीन पर्यावरण मूल्यांकन पैनल
9.निर्णय लेने के मापदंडों को शिथिल करना
10. जैव सुरक्षा व जोखिमों से समझौता करना–खुली हवा में हो रहे परीक्षणों पर अंकुश लगाने के लिए कोई कोशिश नहीं की गई है
11. स्वतंत्र परीक्षण बिल का हिस्सा नहीं हैं
12. कोई जोखिम प्रबंधन तंत्र का न होना
13. हितों के टकराव को पूरी तरह दूर न करना
14. पैनल की धाराओं का कमजोर होना
15.जैव प्रोद्यौगिकी नियामक अपीलीय प्राधिकरण कमजोर और लोगों की न्याय व्यवस्था से दूर करनेवाली
16. दूसरे कानूनों पर अतिक्रमण का असर
17. जीएमओ आयात पर खामोश रहना आदि।


इस बिल पर अधिक जानकारी एवं अन्य खामियों को जानने के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ – http://indiagminfo.org/?page_id=82 हमें खुशी होगी यदि और कुछ विशेष जानकारी के लिए एवं किसी सम्बंधित दस्तावेज के लिए आप हमें संपर्क करते हैं। यह बिल गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है. अतः हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप कृपया २२ नवंबर २०११ को प्रातः १० बजे से पहले-पहले माननीय लोकसभा अध्यक्ष एवं महासचिव को लिखित रूप से इस बिल की introduction के विरुद्ध अपना विरोध पत्र अवश्य भेजें।


अगर किन्ही परिस्थितियों में यह बिल फिर भी पेश हो जाता है तो कृपा कर जरूर सुनिश्चित करें कि तब इसे कम से कम कृषि/स्वास्थ्य/पर्यावरण और विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी के संयुक्त समिति में अवश्य भेजा जाये।

निवेदक :

राष्ट्रीय आशा गठबन्धन                                                                         जी एम मुक्त भारतीय गठबन्धन

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