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मध्य प्रदेश सर्कार की जैविक कृषि नीति
  • जैविक खेती क्यों ?ह्ण मृदा स्वास्थ्य व पर्यावरण – आज यह तथ्य निर्विवाद हो चुका हैं कि रसायनिक उर्वरकों तथा पेस्टीसाइडों के लगातार तथा अविवेकपूर्ण उपयोग के चलते मिट्‌टी के स्वास्थ्य मे गिरावट तथा पर्यावरण प्रदूषित हो चुका हैह्ण रसायनों के उपयोग से पैदा होने वाले खाद्यान्न, फल और सब्जियॉं विषैले होकर इनमें स्वभाविक स्वाद नहीं रहा हैं ।
  • ह्ण मनुष्य स्वास्थ्य – रसायनों के उपयोग से मनुष्यों में तरह-तरह की बीमारियों देखने में आ रही हैं।
  • ह्ण अधिक उत्पादन लागत – रसायनों के मॅंहगें तथा अत्यधिक उपयोग के कारण खेती की लागत बढ़ रही हैं जिसके कारण कृषकों का खेती से मोहभंग हो रहा हैं।ह्ण विषरहित खाद्यान्न के प्रति बढ ती वैद्गिवक एवं स्थानीय जागृति के कारण जैविक कृषि पद्धति से उत्पादित खाद्यान्नों, फल तथा सब्जियों की मॉंग स्थानीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में बढ  रही हैं। ह्ण स्थायी कृषि विकास ;ैन्ैज्।प्छ।ठस्म् ।ळत्प्ब्न्स्ज्न्त्म् क्म्टम्स्व्च्डम्छज्द्ध हेतु जैविक कृषि ही एक मात्र एवं समुचित समाधान प्रतीत होता है।ह्ण प्रदेद्गा में जैविक कृषि की असीम सम्भावनाएं एवं अनुकुल वातावरण उपलब्ध है।ह्ण जैविक कृषि हेतु राज्य के प्रयासों को उचित दिद्गाा, गति एवं नवीन उर्जा के संचार हेतु राज्य में एक समग्र जैविक कृषि नीति की आवद्गयकता को सभी वर्गो द्वारा महसूस किया गया है।
  • २. जैविक खेती से आशय :-
    फसलोत्पादन के लिये उर्वरकों और कीटनाद्गाकों के रुप में उपयोग में लाये जाने वाले रसायनों के स्थान पर गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद तथा बायोपेस्टीसाइड्‌स आदि का उपयोग करना ही सरल भाषा में जैविक खेती है।
    ३. रसायनिक उर्वरकों तथा पेस्टीसाइड्‌स का उपयोग क्यों बढ़ा ? वर्ष १९६६-६७ में देश में हरित क्रान्ति आने के पूर्व हमारे देश के कृषकों के समक्ष सिंचाई के साधन, उन्नत बीज, रसायनिक उर्वरकों /पेस्टीसाइड्‌स की उपलब्धता तथा खेती की उन्नत विधियॉं नहीं थी। हरित क्रान्ति के माध्यम से उक्त चारों घटकों पर कृषि उत्पादन बढाने के लिये कार्य किया गया जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश का उत्पादन बढ ता गया और हम खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हुये परन्तु यह ग्रीन रिव्योलूशन एवरग्रीन साबित नहीं हुयी ।
  • ४. इसके दुष्प्रभावों के चलते हमारी -ह्ण देद्गा के कई क्षेत्रों की मृदा अम्लीय तथा क्षारीय हो गयी और अभी भी मृदा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट हो रहा है। ह्ण रसायनों के कारण पानी की गुणवत्ता खराब हुयी तालाब /नदियों का जल भी प्रदूषित हो रहा है।ह्ण मिट्‌टी की जल-धारण क्षमता कम हुयी है। ह्ण फ्‌लोरा और फौना नष्ट हो रहे हैं। ह्ण हमारा खाद्यान्न उत्पादन बढोत्तरी का भी ग्राफ स्थिर हो चुका है।ह्ण रसायन मॅंहगे होने कारण खेती की लागत लगातार बढ रही है।
    ५. जैविक कृषि नीति के मुखय विशेषता- इस नीति के माध्यम से हम कृषि के उत्पादन के लिये जिम्मेदार चार बाह्‌य घटक क्रमद्गाः जल के साधन, उन्नत बीज, रसायनिक उर्वरक व पेस्टीसाइड्‌स तथा गुड एग्रीकल्चर प्रेक्टीस में से सिर्फ रसायनिक उर्वरक/ पेस्टीसाइड्‌स को ही गोबर की खाद /कम्पोस्ट/ हरी खाद तथा बायो-पेस्टीसाइड्‌स से प्रतिस्थापित करने पर जोर दे रहे हैं। नीति में गौ-वंश आधारित कृषि को अपनाने पर बल दिया हैं जैसा सर्वविदित हैं ।हतपबनसजनतम ूपजीवनज ंदपउंसे पे बतपउम ूपजी दंजनतमण्
  • ६. जैविक कृषि के लागू करने में सरकार की चिन्ता तथा चुनौतियां  ह्ण मुखय प्रश्न यह हैं कि रसायनिक उर्वरक तथा पेस्टीसाइड्‌स के उपयोग से पर्यावरण / मृदा स्वास्थ्य/ मनुष्य का स्वास्थ्य गिर रहा हैं उससे आम कृषक का कोई सरोकार नहीं हैं यह प्रश्न सरकार के लिये विचारणीय हो सकता हैं। कृषक तो वही करेगा जिसमें उसे अधिक आर्थिक लाभ मिले। वह रसायनिक उर्वरकों/ पेस्टीसाइड्‌स को न अपनाकर अपने खेत के उत्पादन को कम होने के खतरे को क्यों मोल लेगा ? अर्थात हम कृषकों को जैविक खेती अपनाने के लिये कैसे प्रोत्साहित करें।ह्ण जैविक खेती हेतु रसायनिक रसायनों के विकल्प के रूप में समुचित मात्रा में कम्पोस्ट/गोबर खाद/ हरी खाद तथा बायो-पेस्टीसाइड्‌स कैसे उपलब्ध हों।ह्ण जैविक पद्धति द्वारा उत्पादित खाद्यान्न, फल तथा सब्जियों के लिये बेहतर मार्केट के अवसर कैसे उपलब्ध कराये जाये जिससे कृषक जैविक खेती के अपनाने से हुए कम उत्पादन का अधिक मूल्य प्राप्त कर हानि की भरपाई कर सकें।ह्ण जैविक कृषि पद्धति से ही उत्पादित खाद्यान्नों, फल व सब्जियों को कैसे प्रमाणित किया जाये ! उपरोक्त चुनौतियों का समाधान तथा सरकार की चिन्ता का निराकरण इस नीति के माध्यम से रणनीतिक सोच को एक प्रखर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ अत्यन्त व्यवहारिक एवं व्यवसायिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। ७.  इस नीति के सफल क्रियान्वयन के पश्चात्‌ हम :-ह्ण खेती की लागत कम कर सकेंगे उत्पादन में स्थिरता एवं स्थाई वृद्धि दर प्राप्त होकर खेती टिकाउ होगी।ह्ण स्वादिष्ट तथा विष रहित खाद्यान्न, फल, सब्जियॉं, दूध, साग, रेद्गाा आदि उत्पादित कर इनकी मूल्य श्रंखला विकसित कर सकेगें।ह्ण मृदा स्वास्थ्य के गिरते स्तर को संवारकर मृदा कार्बनिक पदार्थ को यथोचित स्तर पर लाकर, विषैले एवं अति हानिकारक रसायनों का प्रयोग कम कर पर्यावरण को स्वच्छ तथा विष-रहित कर सकेगे।
  • ह्ण प्रदेद्गा के सीमांत व लघु किसान जैविक पद्धति से खाद्यान्न उत्पादित कर उच्च दरों पर विक्रय कर अधिक मुनाफा कमा सकेगा।ह्ण ग्रामीण युवाओं को गॉवं में ही रोजगार के अवसर मुहैया किये जा सकेंगे। ह्ण कृषक अपनी उपज को अपनी मर्जी से अपने मन-माफिक भाव में बेच सकेगा जिससे उसकी उपज का उसे अधिक से अधिक मूल्य तो मिलेगा ही तथा उपभोक्ता को भी स्वादिष्ट तथा विषरहित ताजा खाद्यान्न/फल/सब्जियॉं प्राप्त होगी।ह्ण द्गाहरी तथा ग्रामीण कचरा आज की गंभीर समस्या बन चुका है इस कचरे को बहुमूल्य कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित कर खेती हेतु उपलबध कराकर प्रदेशवासियों को कचरे की समस्या से निजात दिलाई जा सकेगी। ह्ण कृषकों को अपना उत्पाद मंडियों तक लाने में परिवहन लागत वहन करनी पडती हैं और बिचौलिये भी कृषकों का मण्डी में शोषण करते हैं। इससे कृषकों को शनैःद्गानैः मुक्ति मिलेगी। ह्ण नीति के अनुमोदन एवं क्रियान्वयन पर प्रदेद्गा का राष्ट्र में गौरव बढेगा। ह्ण प्रदेद्गा राष्ट्र का प्रथम जैविक राज्य होने का सम्मान अर्जित कर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विद्गोष छवि बना सकेगा।
  • ८. मध्यप्रदेद्गा सरकार तथा भारतीय जनता पार्टी की पहल- ह्ण आधुनिक रसायन आधारित खेती के दुष्परिणामों के दृष्टिगत रखते हुये दूरदद्गर्िाता का परिचय देते हुये भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष २००८ में प्रदेद्गा में जैविक कृषि पद्धति से खेती करने को प्रोत्साहित करने हेतु जनता से वायदा किया अर्थात जन संकल्प ०८ के जैविक कृषि को बढाबा देना, प्रदेद्गा को जैविक प्रदेद्गा बनाना तथा प्रदेद्गा में जैविक कृषि विद्गवविद्यालय की स्थापना करना महत्वपूर्ण बिषय हैं।ह्ण मध्यप्रदेद्गा सरकार, माननीय मुखयमंत्री जी के योग्य एवं उर्जावान मार्गदर्द्गान में ”कृषि को लाभकारी ” बनाने हेतु कृतसंकल्पित है। सरकार व पार्टी की प्रतिवद्वता तथा सच्चेधरापुत्र के नाते जैविक कृषि के क्रियान्वयन के पुनीत कार्य को पूर्ण करने के क्रम में यह नीति तैयार की हैं।

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